Siddharth Aggarwal 1

Siddhartha Agrawal

छात्रसंघ अध्यक्ष डीएवी पीजी कॉलेज देहारादून (उत्तराखण्ड)

बदलती छात्र राजनीति का परिदृश्य

उत्तराखंड का डीएवी पीजी कॉलेज प्रदेश के सबसे बड़े महाविद्यालयों में पहले स्थान पर आता है। राज्य की छात्र राजनीति में यह कॉलेज अहम स्थान रखता है। यहां होने वाले छात्रसंघ चुनाव पर प्रदेश के सभी राजनितिक हस्तियों की भी नजर रहती है, क्योंकि पूर्व में यहां से छात्रसंघ का चुनाव लड़ने वाले छात्र उत्तराखंड की राजनीति में उच्चस्थ पद पर पहुंच चुके हैं। यहाँ छात्र नेता रहे कई लोग सीएम के साथ-साथ विधायक और मंत्री के पद तक काबिज रहे हैं।

2023 के छात्रसंघ चुनाव के चुनावी परिणाम से प्रदेश की छात्र राजनीति का केंद्र माने जाने वाले डीएवी पीजी कॉलेज में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) को जोरदार झटका लगा। यहां नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसआईयू) से बागी हुए सिद्धार्थ अग्रवाल ने एबीवीपी के प्रत्याशी को जबर्दस्त शिकस्त दी है।

इस वर्ष के छात्रसंघ चुनाव में डीएवी पीजी कॉलेज छात्रसंघ अध्यक्ष बनकर सिद्धार्थ अग्रवाल ने यह सिद्ध कर दिया है कि तकदीर बदल जाती है जब इरादे मजबूत हो। सिद्धार्थ ने महाविद्यालय की छात्र राजनीति के 14 सालों का इतिहास बादल दिया है। 

कॉलेज में छात्रसंघ अध्यक्ष के पद पर 14 साल से एबीवीपी या उसके बागियों का कब्जा रहा। इस साल नए सिरे से एबीवीपी के सामने एनएसयूआई ने दम तो ठोका, लेकिन करीब 12 साल से महासचिव पद पर जीत का रिकॉर्ड बना रहे आर्यन संगठन ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया। कॉलेज में पहली बार छात्रसंघ अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ते हुए आर्यन संगठन ने बाजी आने नाम की।

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छात्र शक्ति की जीत

कहते हैं कि जो जिंदगी की हर कसौटी पर खुद को आजमाता है, वही हर मुसीबतों से लड़कर खुद को मजबूत बनाता है। इस बार के छात्रसंघ चुनाव में अध्यक्ष पद पर सिद्धार्थ अग्रवाल को 1313 मत पड़े, वहीं एबीवीपी के यशवंत को 1131 मत पड़े और एनएसआईयू के राहुल जग्गी को 375 मत प्राप्त हुए। आर्यन छात्र संगठन से चुनाव लड़ने उतरे सिद्धार्थ ने एबीवीपी के यशवंत सिंह पंवार को 182 वोटों से पराजित किया। यद्यपि इस बार छात्र संघ चुनाव में उम्मीदों के विपरीत परिणाम सामने आए, पर निश्चय ही छात्र शक्ति की जीत हुई। 

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सामाजिक और राजनैतिक पृष्ठभूमि

मूलतः उत्तरकाशी के रहने वाले सिद्धार्थ अग्रवाल एक कर्मठ और जुझारू छात्र नेता हैं। वह पूर्व में एनएसयूआई के कार्यकर्ता थे। उन्होने एक साल पहले ही एनएसयूआई से अध्यक्ष पद की तैयारी शुरू कर दी थी लेकिन चुनाव में अध्यक्ष पद पर किसी और छात्र को मौका देने की भनक पड़ते  ही सिद्धार्थ ने 31 अक्टूबर को आर्यन छात्र संगठन का दामन थाम लिया। दूसरे ही दिन उन्होंने नामांकन किया और अब उनके सिर पर अध्यक्ष का ताज सज गया है। यद्यपि  सिद्धार्थ अग्रवाल की इस जीत के कई कारण रहे हैं पर उनकी सफलता के पीछे छात्र छात्राओं के बीच उनकी स्वीकार्यता का बहुत बड़ा योगदान है।

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जीत का कारण और जीत का आशय

आर्यन छात्र संगठन के संस्थापक राकेश नेगी का कहना है कि 2005 में उन्होंने यह संगठन खड़ा किया था। तब वह खुद महासचिव का चुनाव लड़े थे और जीते थे। उन्होने बताया कि 14 सालों में उनका संगठन केवल तीन चुनाव हारा है, जबकि अध्यक्ष पद पर पहली बार प्रत्याशी उतारा और दमदार जीत मिली।

राकेश नेगी का कहना है कि संगठन से जुड़े छात्रों में चुनाव की तैयारी तो पहले से ही चल रही थी। अध्यक्ष पद पर जीते सिद्धार्थ अग्रवाल भी उनसे संपर्क में थे। उनकी लगन और छात्र हित के प्रति भावनाओं को देखते हुए संगठन ने उन पर दांव खेला और जीत उनके हिस्से में आई।

राकेश नेगी ने बताया कि इस चुनाव को लेकर कई पहलुओं पर मंथन लंबे समय से चल रहा था। अन्य छात्र संगठनों से भी वार्ता हो रही थी। सभी समीकरणों पर विचार करने पर यह बात सामने आई कि महाविद्यालय में संगठन की सक्रियता और स्वीकार्यता पर्याप्त थी। चुनाव के अनुरूप संख्याबल उनके साथ था। हर साल महासचिव पद पर भी चुनाव लड़ते हुए आर्यन संगठन को भी एबीवीपी के अध्यक्ष पद के प्रत्यासियों के बराबर ही वोट आता है तो क्यों ना अध्यक्ष पद पर ही अपना प्रत्याशी उतारा जाए, और इसबर एक प्रयोग किया गया। चुनाव परिणाम निश्चय ही उत्साहवर्धक हैं और एक परिवर्तन को दिशा दे रहा है। राकेश नेगी का कहना है कि इस जीत से पूरे संगठन से जुड़े छात्र बेहद उत्साहित हैं। उनका यह भी कहना है कि संगठन पूरी तरह से छात्र हित में काम करेगा और आगे भी छात्रों के विश्वास को बनाए रखेगा।

सिद्धार्थ के इस अप्रत्यासित जीत के पीछे तत्कालिक कारणों और आंदोलनों का प्रभाव भी देखा जा सकता है। सिद्धार्थ लंबे समय से महाविद्यालय की छात्र राजनीति में सक्रिय रहे हैं। छात्रों के बीच उसकी एक अलग छवि है।पिछले दिनों जब डीएवी कॉलेज दीवार टूटने से एक छात्रा की मौत हुई तब से कॉलेज प्रशासन और सरकार के रवैये को लेकर छात्रों में रोष व्याप्त था। इस दौरान सिद्धार्थ अग्रवाल आंदोलन पर उतर आए थे। उन्होने तत्कालीन प्राचार्य डा. केआर जैन और कॉलेज प्रबंधन के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। 21 अक्टूबर को सिद्धार्थ अग्रवाल कॉलेज प्रबंधन के खिलाफ मोबाइल टावर पर चढ़ गए थे। दिन रात चले आंदोलन ने कॉलेज मैनेजमेंट को भी झुका दिया था। छात्र आंदोलन में मिली सफलता ने जौनसार के वोट को भी सिद्धार्थ के समर्थन में कर दिया। छात्र संघ चुनाव में भी उन्हें क्षेत्र विशेष के छात्र छात्राओं का सहयोग मिला। सिद्धार्थ के इसी आंदोलन ने आज उनके सिर पर अध्यक्ष का ताज सजा दिया है।

इससे पहले भी एनएसयूआई में रहते हुए सिद्धार्थ अग्रवाल ने सीयूईटी के फर्जी स्कोर बोर्ड से दाखिलों का पर्दाफाश किया था। जब इस मामले की जांच हुई तो कॉलेज में 26 से ज्यादा तरह के फर्जी दाखिलों का खुलासा हुआ था। इस तरह सहज एवं सौम्य स्वभाव के धनी सिद्धार्थ अग्रवाल ने छात्र हित के लिए संघर्षरत रहने वाले छात्र नेता की छवि बनाई है।

सिद्धार्थ अग्रवाल को निश्चय ही एबीवीपी और एनएसयूआई के बागियों का भी समर्थन मिला। सिद्धार्थ अग्रवाल को अन्य संगठनों में व्याप्त आंतरिक प्रतिद्वंदीता का भी लाभ मिला। दोनों ही संगठन के बागी इसे अपनी रणनीतिक जीत मान रहे हैं। 

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प्राथमिकताएं

सिद्धार्थ आम छत्रों के मुद्दों को लेकर चुनाव में उतरे। उन्होने अच्छी शिक्षा, बेहतर कैम्पस का स्लोगन दिया। जिसे ज़्यादातर छात्र छात्राओं ने अपना समर्थन दिया।

अपनी प्राथमिकताओं को गिनते हुए सिद्धार्थ अग्ग्रावल कहते हैं कि डीएवी कॉलेज के कैम्पस को वाई-फ़ाई फ़्री कैम्पस बनाना, महाविद्यालय में छात्र छात्राओं के लिए 24x7 लाइब्रेरी खुलवाना, महाविद्यालय में समस्त छात्र-छात्राओं के लिए फ़्री पार्किंग की व्यवस्था करना, महानगर के अंदर संचालित इलैक्ट्रिक बसों में स्टूडेंट्स पास की व्यवस्था करना, गर्ल्स हॉस्टल खुलवाना, कैम्पस प्लेसमेंट हेतु कंपनियों को आमंत्रित करना, खेलों में छात्रों की सहभागिता के लिए स्थिति में सुधार करना और कॉलेज की बुनियादी समस्याओं का निराकरण करना उनकी प्राथमिकता होगी। 

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